लोग आमतौर पर सिर्फ नतीजे देखते हैं।
कौन जीता, कौन हारा, कौन पीछे रह गया — यही चीज़ें सबकी नज़र में आती हैं।
लेकिन कोई इंसान कितने दिनों तक अपने अंदर के डर, अनिश्चितता, कमी, अकेलेपन और निराशा से लड़ता रहा, यह बहुत कम लोग देख पाते हैं।
तुमने शायद Larry Page का नाम सुना होगा — Google के co-founder।
आज लोग उसकी सफलता की कहानी जानते हैं, लेकिन शुरुआत में उसका रास्ता बिल्कुल आसान नहीं था।
एक नए idea पर काम करना, लोगों को उस पर विश्वास दिलाना,
और उसे हकीकत में बदलना — इन सबके पीछे अनिश्चितता, दबाव और लंबी खामोश मेहनत छिपी थी।
शायद तुमने भी कई बार शुरू करना चाहा होगा।
कई बार टूट गए होगे।
कई रातें चुपचाप गुज़ारी होंगी, किसी से कुछ कहे बिना, बस अपने अंदर की लड़ाई लड़ते हुए।
बाहर से वह असफलता लग सकती है, लेकिन अंदर से वह टिके रहने की लड़ाई थी।
सब तुम्हें धीरे चलते हुए देखेंगे,
लेकिन तुम धीरे क्यों चल रहे हो, यह नहीं जानेंगे।
सब तुम्हारे रुक जाने की बात करेंगे,
लेकिन कितनी बार टूटकर भी तुमने फिर से शुरुआत की, यह नहीं देखेंगे।
यह दुनिया बहुत कम ही इंसान की अदृश्य लड़ाइयों की कीमत समझती है।
यहाँ ज़्यादातर लोग सिर्फ दिखने वाले नतीजों में व्यस्त रहते हैं।
इसलिए अगर तुम्हारी खामोश लड़ाई कोई न भी देखे, तब भी उसकी कीमत कम नहीं हो जाती।
क्योंकि कुछ लड़ाइयाँ ऐसी होती हैं,
जिनमें टिके रहना ही जीत होता है।
कुछ दिन ऐसे होते हैं,
जब सिर्फ हार न मानना ही सबसे बड़ी हिम्मत होती है।
इसलिए अपनी लड़ाई को छोटा मत समझो।
भले ही सब उसे न समझें, तुम्हारे अंदर की यही खामोश जंग एक दिन तुम्हें ऐसी जगह ले जाएगी, जहाँ लोग सिर्फ तुम्हारी सफलता देखेंगे — लेकिन तुम जानोगे कि उसके पीछे कितनी खामोश लड़ाइयाँ छिपी थीं।
सबसे कठिन लड़ाइयाँ अक्सर बिना शब्दों के लड़ी जाती हैं।
शायद इसी लिए Kahlil Gibran ने कहा था—
Out of suffering have emerged the strongest souls.